कश्मीर-सुषमा -
श्रीधर पाठक
यह कविता कवि श्रीधर पाठक द्वारा रचित 'कश्मीर-सुषमा' से ली गई है, जिसमें कश्मीर की प्राकृतिक सुंदरता का अत्यंत सुंदर वर्णन किया गया है।
पद 1 (पहला छंद)
* पंक्तियाँ:
धनि-धनि श्री काश्मीर-धरनि, मन-हरनि, सुहावनि।
है यह जादूभरी, विश्व बाज़ीगर थैली।।
खेलत में खुलि परी र शैल के सिर पे फैली।।
पुरुष प्रकृति को किधौँ जबै जोबन-रस आयो।
प्रेम-केलि रस-रेलि करन रंग-महल सजायों।।
* भावार्थ:
कवि कहते हैं कि कश्मीर की सुंदर और मन को मोह लेने वाली धरती धन्य (महान) है। यह प्रकृति रूपी बाजीगर (जादूगर) की एक ऐसी जादू भरी थैली के समान है, जो खेल-खेल में पर्वत की चोटियों पर खुलकर फैल गई है। ऐसा प्रतीत होता है मानो जब 'पुरुष' (परमात्मा) और 'प्रकृति' अपने पूर्ण यौवन और प्रेम के रस में डूबे, तो उन्होंने अपनी प्रेम-क्रीड़ा और आनंद के लिए इस धरती को एक 'रंग-महल' की तरह सजा दिया।
पद 2 (दूसरा छंद)
* पंक्तियाँ:
धन्य यहाँ की धूलि, नीरद, नभ, तारे।
धन्य धवल हिम श्रृंग, तुंग, दुर्गम, दृग-प्यारे।।
धन्य नदी नद स्रोत, विमल गंगोद-गोत जल।
सीतल सुखद समीर, वितस्ता तीर-स्वच्छ-थल।।
* भावार्थ:
कवि कश्मीर के कण-कण की प्रशंसा करते हुए कहते हैं कि यहाँ की धूल, बादल (नीरद), आकाश और तारे सब धन्य हैं। यहाँ की ऊँची, दुर्गम और आँखों को प्रिय लगने वाली बर्फ से ढकी सफ़ेद पर्वत चोटियाँ धन्य हैं। यहाँ बहने वाली नदियाँ, झरने और गंगाजल के समान पवित्र एवं निर्मल जल स्रोत धन्य हैं। साथ ही, यहाँ चलने वाली शीतल-सुखद हवा और झेलम (वितस्ता) नदी के तट तथा स्वच्छ स्थान भी अत्यंत वंदनीय हैं।
पद 3 (तीसरा छंद)
* पंक्तियाँ:
मानसरोवर मान-हरन, सुंदर मानसबल।
धनि-गंधरबल, 'गगरीबल', श्रीनगर स्वच्छ डल।।
एक-एक सोँ सुधर अनेक सरोवर छाये।
प्रकृति देवि निज-रूप-लखन, मनु मुकुर लगाये।।
* भावार्थ:
कश्मीर के प्रसिद्ध जलशयों का वर्णन करते हुए कवि कहते हैं कि मानसरोवर का मान (अहंकार) भी यहाँ के सुंदर 'मानसबल' झील के आगे कम पड़ जाता है। यहाँ का गंधरबल, गगरीबल और श्रीनगर की स्वच्छ डल झील सब धन्य हैं। यहाँ एक से बढ़कर एक कई सुंदर सरोवर फैले हुए हैं। इन्हें देखकर ऐसा लगता है मानो स्वयं प्रकृति देवी ने अपना रूप देखने के लिए यहाँ सुंदर दर्पण (शीशा) लगा दिए हों।